success story of narendra modi in hindi । by tech desai


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्म गुजरात में हुआ नरेंद्र मोदी के बारे में पूरी फिल्म पूरी स्टोरी जो 5 अप्रैल को रिलीज होने वाली है इस फिल्म में यह ट्रेलर हिंदुस्तान आतंकवादी से नहीं डरता आतंकवादी हिंदुस्तान से डरता है। इस फिल्म का यह सबसे बड़ा डायलॉग है,


Modi film
Modi film
इस फिल्म में बर्फीले इलाक़े में सैनिकों की टुकड़ी के साथ पुल पर सबसे आगे एक आदमी हाथ में तिरंगा लिए चल रहा है,और संवादी बोलने से कुछ सेकेंड पहले उस व्यक्ति के ऊपर गोलियों की बरसात करते हैं.लेकिन सैनिको  ने जवाबी कार्रवाई करते हूए वो आदमी अपने घुटनों के बल पर बैठ जाता है लेकिन तिरंगे को थोड़ा सा भी झुकने नहीं देता है।


यह ट्रेलर ढाई मिनट है लेकिन इस फ़िल्म का सबसे शानदार सीन है जो आदमी हाथ में झंडा उठाए वह कोई और नही वो व्यक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं. लोकसभा चुनावों से ठीक पहले इस फ़िल्म ने देश में राजनीतिक को तूफान के जैसा कर दिया है.



एक तरफ विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इस फ़िल्म की रिलीज पर काफी विरोध जताया है.

लोकसभा चुनावों के पहले चरण की वोटिंग से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक फिल्म 'पीएम नरेंद्र मोदी' को सिनेमाघरों में रिलीज करने की योजना बनाई गई है।लेकिन इस फिल्म कि रिलीज डेट बिल्कुल नजदीक रखी हुई है वह 05 अप्रैल को इसकी रिलीज date रखी हुई है,


कांग्रेस पार्टी का विरोध है कि इस फिल्म का निर्माण भाजपा ने ही करवाया है और कांग्रेस पार्टी का कहना है कि भाजपा फिकी राजनीति बकरार दे रही है.


लेकिन इस फ़िल्म मे भारतीय जनता पार्टी कहीं भी किसी तरह से जुड़ी हुई नहीं दिखाई देती है लेकिन हाँ इस फिल्म मे मोदी का किरदार निभाने वाले विवेक ओबेरॉय ही हैं लेकिन वो बीजेपी के  समर्थक रहे हैं.और इस महीने की शुरुआत में इस फिल्म के ट्रेलर लॉन्च करने के मौके पर एक सवाल के जवाब में उन्होंने पार्टी के एक चुनावी दौरे मे किया गया था इस तरह नारा है "मोदी है तो मुमकिन है" को दोहराया था.
लेकिन इस फ़िल्म के प्रोमोशन मे ऐसे कई कार्यक्रम हुए जिसमें भाजपा के वरिष्ठ नेता भी दिखते हुए नज़र आए हैं.
लेकिन इस तरफ निर्वाचन आयोग यह जांच कर रहा है कि फ़िल्म रिलीज से आचार संहिता का उल्लंघन तो नहीं हो रहा है. और इस फ़िल्म के प्रोड्यूसर ने निर्वाचन आयोग से कहा है कि इसके निर्माण में उन्हीं का पैसा लगा हुआ है.

इस फिल्म के लेखक और film producer
संदीप सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा कि हमने "एक महान व्यक्तित्व" की कहानी को भारत देश ही नहीं ब्लकि पुरे विश्व को बताना चाहते हैं ताकि लोग "इससे प्रेरणा ले सके,और कुछ सिख सकें."

और उन्होंने मीडिया से बात करते हुए ये भी कहा कि "मुझे राजनीति, राजनेताओं या फिर किसी भी राजनीतिक पार्टीओ से कोई लेना-देना नहीं है. अगर वो विपक्षी राजनेता एक फ़िल्म से डरते हैं तो क्या वो अपने काम के प्रति आश्वस्त नहीं हैं जो उन्होंने अपने देश और अपने राज्यों के लिए कुछ किया है."
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पूरी कहानी
मोदी की कहानी




हालांकि अभी तो इस फ़िल्म का ट्रेलर ही लॉन्च हुआ है,औअभी सिनेमाघरों में फ़िल्म का रिलीज होना तो बाकी है,तब विपक्षीऔ का क्या होगा, इससे पहले ही कुछ आलोचना मे इस मुवी को प्रोपेगेंडा मूवी करार दे रहे हैं.
और राजा सेन ने मीडिया और पत्रकारों से क ा, "फ़िल्म रिलीज की टाइमिंग इसे संदिग्ध बनाती है. जनवरी में इसकी शूटिंग शुरू हुई और अप्रैल में यह रिलीज हो रही है. चुनावों से पहले इसे रिलीज़ करना मोदी की छवि को भुनाने की कोशिश है और इस फ़िल्म की यह कोशिश भी  होगी कि वो उस छवि का प्रचार करे जो वो चाहती है."

और इस फिल्म मे PM नरेंद्र मोदी के बारे में बताया गयानं है कि वो बचपन में रेल गाड़ियों में चाय बेचते थे और वहां से उन्होंने देश के प्रधानमंत्री पद तक की यात्रा की है.
और वो दक्षिणपंथी हिंदू संगठन आरएसएस से भी जुड़े रहे हैं और 13 साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री भी रहे. उनकी व्यक्तिगत अपील और सख़्त हिंदू राष्ट्रवादी नेता की छवि ने पार्टी को लोकप्रियता दिलाई है.

और कई आलोचकों को ट्रेलर का वो सीन चौकाता है जिसमें नरेंद्र मोदी 2002 में हुए गुजरात के दंगों के बाद परेशान और दुखी दिख रहे हैं. दंगों में मारे गए सभी अधिकतर मुसलमान थे.

और दंगों के वक़्त नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री थे और उन पर आरोप था कि उन्होंने इसे रोकने के लिए उचित कदम कयों नहीं उठाए गए।

और इसके बाद अमरीका ने उन्हें वीज़ा भी देने से इनकार कर दिया था. हालांकि 68 साल के मोदी हमेशा इन आरोपों को ग़लत बताते रहे हैं.


काल्पनिक घटनाक्रम

पत्रकारों और 2013 में मोदी की जीवनी लिखने वाले नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं, "यह मोदीजी के जीवनी की एक काल्पनिक कहानी है."

नीलांजन मुखोपाध्याय ने मोदी पर जो किताब लिखी है उसका नाम है 'नरेंद्र मोदीः द मैन, द टाइम्स.'
और वो कहते हैं कि जिस सीन में नरेंद्र मोदी सैनिकों के साथ हाथों में तिरंगा लिए डटकर कर मुकाबला कर रहे हैं, वो पार्टी की मौजूदा राजनीतिक भावना से उनके अतीत को जोड़ने की कोशिश कर रहा है.

वो कहते हैं, "इसके विपरीत उन पर आरोप लगे हैं कि दंगों के दौरान मुख्यमंत्री कार्यालय ने मुश्किल घड़ी में सही कदम नहीं उठाए."1992 में मोदी बतौर बीजेपी कार्यकर्ता तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी के साथ उस दक्षिण से उत्तर तक चली उस यात्रा में शामिल हुए थे जिसका समापन कश्मीर की घाटी में तिरंगा फ़हराने के साथ हुआ थाःः
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मुखोपाध्याय ने कहा कि इस काफ़िले मे गोली फ़ायरिंग भी हुई थी मगर पंजाब में सिख चरमपंथियों की ओर से हु ंं.
वो कहते हैं कि पाकिस्तान विरोधी भावना और कठोर कश्मीर नीति मोदी और बीजेपी के चुनाव अभियान के केंद्र में है. ऐसे में प्रधानमंत्री को कश्मीर में चरमपंथ के ख़िलाफ़ जंग में आगे खड़ा दिखाने से देश में काफ़ी लोगों पर असर पड़ेगा.
"वर्तमान के हिसाब से ढालने के लिए उनके इतिहास को बदला जा रहा है. प्रोडेक्टर संदीप सिंह ने माना कि भले ही इस फ़िल्म के घटनाक्रम सत्य घटनाओं पर आधारित हैं मगर उन्हें "थोड़ा सा काल्पनिक रूप दिया गया है."

राष्ट्रवादी छवि में इज़ाफ़ा

कांग्रेस और अन्य पार्टियों ने तर्क दिया है कि फ़िल्म को चुनाव के दौरान रिलीज़ नहीं किया जाना चाहिए.
इस फ़िल्म के अलावा 10 एपिसोडों वाली 'मोदी: जर्नी ऑफ़ अ कॉमन मैन' स्ट्रीमिंग प्लैटफ़ॉर्म इरोज़ नाऊ पर अप्रैल में रिलीज़ होने वाली है.

वेब सिरीज़ और फ़िल्म पीएम नरेंद्र मोदी इस तरह की अकेली कृतियां नहीं हैं. ऐसी कई फ़िल्में बनी हैं जो स्पष्ट तौर पर राजनीतिक हैं और वोटों पर असर डाल सकती हैं.
मोदीजी से पहले प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह के जीवन पर आधारित "दि ऐक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर" इसी साल जनवरी में रिलीज़ हुई थी और इसकी कड़ी आलोचना भी हुई थी. इसे कुछ लोगों ने कांग्रेस की छवि पर प्रहार के तौर पर देखा लेकिन ज्यादा कुछ असर नहीं हुआ ।

और फ़िल्म- उरी- दि सर्जिकल स्ट्राइक में भारत के 2016 के उस कथित सैन्य अभियान का नाट्य रूपांतरण दिखाया था जिसे आर्मी बेस पर हमले के बाद पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में अंजाम दिया गया था.

इस देशभक्ति वाली फ़िल्म का मकसद भी मोदी की राष्ट्रवादी छवि में इज़ाफ़ा करना था. इस फ़िल्म के जारी होने के छह हफ़्ते बाद भारत ने कश्मीर के पुलवामा में सुरक्षाबलों पर एक और हमला होने के बाद पाकिस्तान में हवाई हमले किए थे.
अब बीजेपी के समर्थकों के बीच 'सर्जिकल स्ट्राइक' एक नारा बन गया है. बीते गुरुवार को अपनी एक रैली में प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके अंदर ही "ज़मीन, हवा और अंतरिक्ष में सर्जिकल स्ट्राइक करने की हिम्मत थी."

मगर फ़िल्म निर्माता सत्ताधारी सरकार की ही ख़ुशामद में नहीं जुटे हैं. 'माई नेम इज़ रागा' एक ऐसी फ़िल्म है जो मोदी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के जीवन के बारे में है. फ़िल्म के निर्देशक इसे एक 'कमबैक' यानी शानदार वापसी की प्रेरक कहानी के रूप में प्रचारित कर रहे हैं. ताकतवर क्षेत्रीय राजनेताओं पर भी इस साल कई फ़िल्में आईं.

दशकों तक भारत की फ़िल्म इंडस्ट्री पर सेंसर बोर्ड का नियंत्रण रहा था और अति राजनीतिक फ़िल्में कम ही बना करती थीं. मगर सेन कहते हैं कि हाल के महीनों में जिस तरह से अचानक ऐसी फ़िल्में आई हैं यह बात 'बेहद अनोखी' है.
सेन कहते हैं कि उनकी नज़र में पीएम नरेंद्र मोदी जैसी फ़िल्मों का भले ही शहरी लोग मज़ाक उड़ाए मगर मीडिया उनकी आलोचना कर ले मगर "ट्विटर पर वो ही अकेले नहीं हैं जो वोट देते हैं."

और वो कहते हैं, कि"मुख्य बात यह है कि शहरों से बाहर के या फिर देश के कम शिक्षा वाले हिस्सों में रहने वाले लोग अतिश्योक्ति भरे फ़िल्मी नज़ारे से प्रभावित हो सकते हैं."
"और भारत के पब्लिक के बीच यह धारणा है कि जो बात सच न हो, वह फ़िल्मों मे नहीं दिखाई जानी चाहिए,

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